
प्रिय भारतवासियों
एक बात दिल में है जिसे आज जुबां पर लाना चाहता हूँ। हम क्या थे और क्या हो गये। आज जब अपने देश
के बारे में सोचता हूँ तो मन बार-बार रोता है। हम आज धर्म और जाति के नाम पर लड़ रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे
हमारा देश जंग का मैदान हो गया है। हम प्राचीन काल से ही आपस में लड़ने के रोग से पीड़ित रहे हैं। इसी का फ़ायदा
बार-बार विदेशियों ने हमें गुलाम बनाकर उठाया है। हमारा देश कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था लेकिन आज
हम इस सोने की चिड़िया के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकते। कल्पना कीजिए यदि किसी बगीचे में तरह-तरह के
फूलों की जगह केवल एक ही तरह के फूल हों तो क्या वह बगीचा अच्छा लगेगा? आखिर हम चाहते क्या हैं? क्या
आपस में घृणा करना हमारा धर्म और जाति-मजहब के नाम पर अशांति और अहिंसा हमारा कर्म है? नहीं! हमारी
मानसिकता चंद शातिर लोगों की गुलाम बनकर रह गई है। अब हमें इस गुलामी की मानसिकता से पार पाना होगा।
अब हमें ऐसे लोगों को आइना दिखाना होगा जो अपने स्वार्थ के लिये हमें जाति-धर्म के नाम पर लड़ाते हैं। अपने तुच्छ
स्वार्थों को छोड़कर हमें अपने देश के बारे में सोचना होगा। हमारा देश तभी समृद्ध बन पयेगा जब हम एक रहेंगे।
उठो! धरा के अमर सपूतों, पुन: नया निर्माण करो................................।